Sunday, June 1, 2014

VG_P2

अजनबी बनने का वादा किया था हमने,
पर निभा ना पाए।
दोस्त बनाने की कोशिश, समझो नाकाम होती जाए।।
निकले तो थे घर से, बड़े गुरूर से,
बने रहेंगे अजनबी एकदम जरूर से।
पर आस पास के चेहरों ने ऐसा माहौल तैयार किया,
कि हमारा दृढ़ संकल्प पूर्णतः  बेकार किया।
धीरे धीरे पहचाना उन चेहरों को,
एक टक देखते रहे, जैसे देखता हो कोई सागर की लहरों को।
फिर जाना उनके शहरों को।।
फिर तो बातों का शुरू हुआ ऐसा सिलसिला,
कि जैसे हो कोई वृहद काफिला।।
न जाने वो कस्में वादे कहाँ गए,
सामने वाले की एक मुस्कान सारे जज्बात बहा गए।।
और इस तरह ये दो दिन का सफर,
कब कटा कुछ पता हीं न चला।
मिटी सारी दूरियाँ, सारा सिकवा गिला।।
फिर भी ये जज्बात रही दिल में
कि वो मिल कर भी  मुझे, मानो जैसे कुछ ना मिला।।

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